Wednesday, February 15, 2006

आ गया बसन्त

आने लगी बगियन में पीली बहार
बहने लगी पूरब की मीठी बयार
ठिठुरन का धीरे-धीरे होने लगा अन्त
मन में अहसास हुआ आ गया बसन्त।

किरनों के मोती हैं दमक रहे घास में
कलियों के अधर खुले भौरों की आस में
आमों की डाली भी झूम रही बौर से
फूल-फूल तितलियाँ घूम रहीं भोर से
मदमाती महुए की गंध दिग दिगन्त
मन में अहसास हुआ आ गया बसन्त।

अखुआईं कोंपलें फिर तरुओं की डाली पर
यौवन का नूर छाया कोयलिया काली पर
सरसों भी रीझ रही हरियाले खेत में
गौरैया मगन हुई आंगन के रेत में
ठहरा 'रवि` देखने को खुशियाँ अनन्त
मन में अहसास हुआ आ गया बसन्त।
****
-यशपाल सिंह 'रवि`

1 Comments:

At 6:30 AM, Anonymous Anonymous said...

Basant per aapki kavita bahut sunder hai. internet per yah kavita dekar aapne bahut achcha kiya hai, Basant ka sahi mane ahsas to man main hi hota hai, sunder panktiyan hain...... badhayi aapko....
Dr.Dinesh Pathak shashi, Mathura

 

Post a Comment

<< Home