Wednesday, February 15, 2006

मेरे देश का किसान


देश की खुशहाली की खातिर हो जाता कुर्बान
मेरे देश का किसान, मेरे देश का किसान।
बारिश, ओले, तपती लू भी जिसको रोक न पाई
चीर के सीना इस धरती का जिसने फसल उगाई
जिसकी मेहनत के बल पर ही भारत बना महान।
मेरे देश का किसान, मेरे देश का किसान।।

शहरी दुनिया छोड़ जिसे है लगता प्यारा गाँव
दुनिया भर के सुख से बढ़कर है पीपल की छाँव
नीले अम्बर के नीचे है जिसकी ऊँची शान।
मेरे देश का किसान, मेरे देश का किसान।।

लालच, लोभ, स्वार्थ से जिसे न किंचित मोह हुआ है
गद्दारी-मक्कारी ने भी जिसको नहीं छुआ है
धन की खातिर कभी न जिसने बेंचा है ईमान।
मेरे देश का किसान, मेरे देश का किसान।।
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-यशपाल सिंह 'रवि`

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